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रामपुरहाट नरसंहार: 13 लोग ज़िंदा जलाकर मारे गए, बुद्धिजीवी व 'टूलकिट-गैंग' हैं मौन

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हत्याएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। ताज़ा मामला बीरभूम जिले के रामपुरहाट क्षेत्र का है। यहां सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस के एक नेता की हत्या से गुस्साई तृणमूल की भीड़ ने सोमवार की रात 12 घरों में आग लगा दी, जिससे लगभग 13 लोग ज़िंदा जल गये। इसमें एक ही घर से 7 लाशें पुलिस ने बरामद की हैं।

बता दें कि बीते सोमवार को बार्शल गांव में टीएमसी नेता भाडू शेख पर बम से हमला हुआ था, जिससे अस्पताल में उनकी मौत हो गई थी। इससे भड़के उनके समर्थकों ने सोमवार रात ही एक दर्जन से ज्यादा घरों को आग के हवाले कर दिया, जिनमें 13 आदिवासियों को अपनी जान गंवानी पड़ी। उपद्रवियों ने क्रूरता की हदें पार करते हुए आग लगाने से पहले घरों को बाहर से बंद कर दिया, जिससे लोग बाहर नहीं निकल पाए। घटना पर गृह मंत्रालय ने सूबे में बिगड़ती कानून व्यवस्था पर राज्य सरकार से जवाब मांगा है। वहीं राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने घटना को भयावह बताया है। एक स्थानीय महिला का कहना है कि अब वे पलायन करने पर मजबूर हैं। मृत 13 लोगों में से एक उनका देवर है।


ममता बनर्जी के सीएम बनने के बाद से बढ़ी हैं घटनाएं

यूं तो पिछले कुछ वर्षों का ग्राफ देखा जाए तो बंगाल में यह हत्याएं 2019 के आम चुनावों के समय से लगातार बढ़ी हैं। तब चुनाव के बीच बार बार खबरें आती रहीं कि सत्तारूढ़ दल के समर्थकों द्वारा बीजेपी समर्थकों सहित अन्य विपक्षी दलों के समर्थकों को निशाना बनाया गया। यही नहीं, बीजेपी के कई सांसदों तथा विधायकों को भी नहीं बख्शा। 2019 में ही विजयादशमी के दिन आरएसएस कार्यकर्ता एवं शिक्षक बंधू प्रकाश पाल, उनकी गर्भवती पत्नी व 8 साल के बेटे की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई। इसके बाद यह घटनाक्रम कुछ समय तक शांत रहा। लेकिन फिर से गत वर्ष 2021 में ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य में हत्या की घटनाओं में इज़ाफ़ा हुआ है। मालूम हो कि टीएमसी के चुनाव जीतते ही 4 मई को बीजेपी कार्यकर्ता बिस्वजीत महेश की पीट पीटकर हत्या कर दी गई थी और उनका शव पास के तालाब से बरामद हुआ था। इसका आरोप टीएमसी समर्थकों पर लगा था। इस मामले में कोलकाता हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया था। इसी तरह उसी वर्ष 23 जनवरी को टीएमसी समर्थकों की भीड़ ने बीजेपी के मंडल अध्यक्ष मनोज सिंह पर हमला किया था, जिसमें उनका सिर फूट गया था।

हमलों का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। मेदिनीपुर के खेजुरी में बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी की रैली में शामिल होने जा रहे समर्थकों पर बम से हमला किया गया था, जिसमें कईयों को गंभीर चोटें आई थीं। 22 नवंबर, 2021 को बीजेपी नेता एवं विधानसभा में नेता विपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि जब वह कोंटाई से कोलकाता जा रहे थे तो 150 से ज्यादा टीएमसी समर्थकों ने उनके काफिले पर हमला किया, जिसमें वह बाल बाल बचे। इसी तरह अलग अलग हिंसा की घटनाओं में सिर्फ बीजेपी ही नहीं, बल्कि कांग्रेस और सीपीआई के लगभग 150 से ज्यादा कार्यकर्ताओं की जान गई है और इन सबका आरोप टीएमसी नेताओं और उनके समर्थकों पर है। इन्हीं हमलों से डरें सहमे बीजेपी व कांग्रेस के कई नेताओं ने टीएमसी की सदस्यता ले ली। जिनमें टीएमसी छोड़कर बीजेपी में आए मुकुल रॉय अपने बेटे सुभ्रांशु के साथ और बीजेपी सांसद बाबुल सुप्रियो सहित अन्य नेता शामिल हैं।


मुख्यधारा मीडिया ने रामपुरहाट की घटना पर बंद कर ली हैं आंखें

आपको स्मरण होगा कि हमारे देश की मीडिया में एक ऐसा समूह है, जो चुनिंदा घटनाओं को जोर शोर से उठाता है। सिर्फ इतना ही नहीं, उनके इस काम को भारत विरोधी अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों से भी वाहवाही मिलती है और हमारे देश के बुद्धिजीवी इससे अपने जेब गरम करते हैं। ये सब करने से पहले वे यह देखते हैं कि घटना जिस राज्य में हुई है, वहां बीजेपी व इसके सहयोगियों की सरकारें हैं या फिर अन्य दलों की। घटना में पीड़ित की जाति-धर्म का पता लगाते हैं। अगर सब कुछ उनके एजेंडे का अनुरूप फिट बैठा तो फिर शुरू होता है 'टूलकिट गैंग' का विलाप। समूह में शामिल सभी सदस्यों के व्हाट्सएप पर घटना संबंधी कंटेंट भेजा जाता है और समय तय किया जाता है। इसके बाद क्या होता है, ये बताने की आवश्यकता नहीं। रामपुरहाट की घटना पर यह समूह तो ऐसे गायब हुआ है, जैसे गधे के सिर से सींग।

मतलब 13 लोग जिंदा जले हैं, लेकिन इन्होंने ऐसे चुप्पी साध रखी है जैसे इनके मुंह में दही जमा हो। सिर्फ इसलिए क्योंकि घटना तृणमूल कांग्रेस शासित बंगाल की है और आरोपी भी सत्तारूढ़ दल के समर्थक हैं। सोचिए कि कोई इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है? घटना घटे आज तीन दिन हो गए, लेकिन मुख्यधारा मीडिया में इस बाबत एक भी डिबेट नहीं, कोई चर्चा नहीं।

हाल की ही बात है, यही पूरा गैंग 'द कश्मीर फ़ाइल्स' फिल्म का विरोध यह कहकर कर रहा है कि इससे मुस्लिमों के खिलाफ नफ़रत फैलाया जा रहा है, जबकि फिल्म में आतंकियों की कारस्तानियां दिखाई गयी हैं, लेकिन बुद्धिजीवी इसे मुस्लिम विरोधी साबित करने पर तुले हैं। ये ऐसे लोग हैं कि अगर बीजेपी शासित राज्य में गलती से भी किसी की जान चली जाए और आरोपी या तो सत्तारूढ़ दल का समर्थक हो या फिर ऊंची जाति का, तो फिर ऐसा विलाप करते हैं, मानों देश में सारी संवैधानिक मशीनरी विफल हो चुकी हैं। मामला दिल्ली से लेकर संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका में बैठे इनके आकाओं तक पहुंच जाता है। यह गैंग धीरे धीरे देश के युवाओं का 'ब्रेनवॉश' कर रहा है, इसलिए आज की युवा पीढ़ी को इनसे सतर्क रहने की जरूरत है।

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