कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के 32 वर्ष बीत गए। पर आज भी वे उन्मादियों के अत्याचार से पीड़ित अपने ही देश में शरणार्थी का जीवन जीने को मजबूर हैं। आज भी उन्हें अपने साथ घटी उस वीभत्स घटना का स्मरण होने पर उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनके भीतर इस कदर डर ने घर कर रखा है कि आज कश्मीर में परिस्थितियां कुछ हद तक ठीक होने के बाद भी वे बिना किसी ठोस सरकारी आश्वासन और सुरक्षा के वापस जाना नहीं चाहते हैं। घाटी में 32 साल पहले पाकिस्तान समर्थित अलगाववादियों के बढ़ते उग्रवाद से पीड़ित पंडितों ने सिर्फ अपने और अपनों की जान बचाने के लिए नौकरी, घर, ज़मीन, आदि सब कुछ छोड़कर देश के दूसरे हिस्सों में शरण ले लिया और आंतरिक रूप से विस्थापित (Internally Displaced People) हो गये। क्या है मुख्य वज़ह जिससे कश्मीरी पंडितों को रातों रात विस्थापित होना पड़ा? पंडितों के साथ भेदभाव तब शुरू हुआ जब शेख अब्दुल्ला वर्ष 1977 में चुनाव जीतकर राज्य के मुखिया के पद आसीन हुए। सूबे का मुख्यमंत्री बनते ही उनकी जो सेक्युलर छवि थी, उसको उन्होंने इस्लामिक कट्टरवाद की छवि में परिवर्ति...
Chronicles of India, Hindus and the world